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The Essence and Practice of Puja: A Complete Guide to Devotional Worship.

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Definition of Puja. Puja is a methodical act of offering service, praise, prayer, salutation, and devotion that reveals and glorifies the divine qualities and presence of God . In essence, it is the spiritual union between the devotee and the Divine. The essence of  Puja  is bhakti (devotion) , without bhakti,  Puja  bears no fruit. श्रद्धा-भक्ति परमं साधनम् । भक्तिरेव पुष्पं भक्तिरेव फलम्।   भक्तिरेव पूजा भक्तिरेव अर्घ्यम्।   भक्तिरेव योगो भक्तिरेव यज्ञः।   श्रद्धाभक्तिविना सर्वं निष्फलम्॥ भक्तिनीतिः  बाह्या भक्तिर्दुराचारः, अन्तर्भक्तिः सदाचारः। अन्तर्भक्त्या आत्मशुद्धिः, आत्मशुद्ध्या ईश्वरप्राप्तिः॥ ॐ श्रीहरिनारायणं वन्दे चतुर्व्यूहरूपिणम्। प्रकृतिं परमात्मिकां वन्दे हरिं मोक्षप्रदम्॥ ★ ॐ श्रीजगन्नाथाय नमः। ॐ श्रीबलभद्राय नमः॥ ॐ श्रीप्रद्युम्नाय नमः। ॐ श्रीअनिरुद्धाय नमः॥ ॐ श्रीनारायणाय नमः। ॐ श्रीशेषनागाय नमः॥ ॐ श्रीमहालक्ष्म्यै नमः। ॐ श्रीनारायण्यै नमः॥ ॐ परमात्माय नमः। ॐ परमात्मिकायै नमः॥ ॐ प्रकृत्यै नमः। ॐ सर्वभूतहितप्रदायै ...

पूजा की परिभाषा,पूजा के प्रकार,पूजा के भेद,पूजा का फल,पूजा में फल प्राप्ति के उपाय।

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पूजा की परिभाषा: भगवान के गुणों का प्रकाशन करने वाली और उनके दिव्य स्वरूप को अभिव्यक्त करने वाली सेवा, स्तुति, प्रार्थना, प्रणाम एवं श्रद्धा की जो विधिपूर्वक प्रक्रिया है, वही पूजा कहलाती है। संक्षेप में कहें तो, सेवक और ईश्वर के बीच की आत्मिक एकता ही पूजा है। पूजा का मूल तत्व है भक्ति — भक्ति के बिना पूजा निष्फल होती है। श्रद्धा-भक्ति परमं साधनम् । भक्तिरेव पुष्पं भक्तिरेव फलम्।   भक्तिरेव पूजा भक्तिरेव अर्घ्यम्।   भक्तिरेव योगो भक्तिरेव यज्ञः।   श्रद्धाभक्तिविना सर्वं निष्फलम्॥ भक्तिनीतिः   बाह्या भक्तिर्दुराचारः, अन्तर्भक्तिः सदाचारः। अन्तर्भक्त्या आत्मशुद्धिः, आत्मशुद्ध्या ईश्वरप्राप्तिः॥ न लाभं प्राप्नुयति हरिः कर्मकाण्डैः कदाचन । साधकः स्वहितार्थाय तैरेव फलमश्नुते नरः॥ मन्त्र–यज्ञ–पूजा–कथा ब्रह्मणा आरम्भितो मन्त्रः ब्रह्मणैव समापितः । स एव श्रेष्ठो मन्त्रः सर्वमन्त्रेषु कीर्तितः ॥ ब्रह्मणा आरम्भितो यज्ञः ब्रह्मणैव समापितः । स एव श्रेष्ठो यज्ञः सर्वयज्ञेषु कीर्तितः ॥ ब्रह्मणा आरम्भिता पूजा ब्रह्मणैव समापिता । सा एव श्रेष्ठा पूजा सर्वपूजासु कीर्त...

जनेऊ या यज्ञोपवीत धारण विधि। The procedure for wearing the sacred thread ( "Janeyu" or "Yajnopavita")

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  Yajnopavitam (यज्ञोपवीतम्) English-and-Hindi version:- यज्ञोपवीत सनातन हिंदू धर्म के 16 संस्कारों [  गर्भाधान संस्कार: पुंसवन संस्कार:सीमन्तोन्नयन संस्कार:जातकर्म संस्कार:नामकरण संस्कार:निष्क्रमण संस्कार:अन्नप्राशन संस्कार:चूड़ाकर्म संस्कार: विद्यारम्भ संस्कार:कर्णवेध संस्कार: यज्ञोपवीत संस्कार : वेदारम्भ संस्कार :केशान्त संस्कार:समावर्तन संस्कार:विवाह संस्कार:अंत्येष्टि संस्कार: ]   में से एक है। यज्ञ रूपी परमात्मा के लिए जो प्रतिज्ञा सूत्र धारण किया जाता है, उसे यज्ञोपवीत कहते हैं। इसे जनेऊ या यज्ञ सूत्र भी कहा जाता है। जनेऊ के तीनों सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं। यज्ञोपवीत (संस्कृत संधि विच्छेद: यज्ञ + उपवीत) धारण करने के संस्कार को उपनयन संस्कार कहा जाता है। उपनयन संस्कार के बाद बालक का गुरुकुल में विद्यारंभ होता है। यज्ञोपवीतम्-जनेऊ या यज्ञोपवीत। यह पवित्र धागा सूत से बना होता है, जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर और दाईं भुजा के नीचे पहनता है। यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र है, जिसे विशेष विधि से ग्रंथित करके बनाया जाता है। इसमें सात ग्रं...