जनेऊ या यज्ञोपवीत धारण विधि। The procedure for wearing the sacred thread ( "Janeyu" or "Yajnopavita")

 

Yajnopavitam (यज्ञोपवीतम्)

यज्ञोपवीतवर्णनम्
यज्ञोपवीतं त्रिसूत्रात्मकं शुभम्।
प्रत्येकसूत्रं त्रितन्तुमयं स्मृतम्॥
नवतन्तुसमायुतम् एवं परमपवित्रम्।
ब्रह्मग्रन्थियुक्तं हि यज्ञोपवीतम्॥
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English-and-Hindi version:-

यज्ञोपवीत सनातन हिंदू धर्म के 16 संस्कारों गर्भाधान संस्कार: पुंसवन संस्कार:सीमन्तोन्नयन संस्कार:जातकर्म संस्कार:नामकरण संस्कार:निष्क्रमण संस्कार:अन्नप्राशन संस्कार:चूड़ाकर्म संस्कार: विद्यारम्भ संस्कार:कर्णवेध संस्कार:यज्ञोपवीत संस्कार:वेदारम्भ संस्कार:केशान्त संस्कार:समावर्तन संस्कार:विवाह संस्कार:अंत्येष्टि संस्कार:]  में से एक है। यज्ञ रूपी परमात्मा के लिए जो प्रतिज्ञा सूत्र धारण किया जाता है, उसे यज्ञोपवीत कहते हैं। इसे जनेऊ या यज्ञ सूत्र भी कहा जाता है। जनेऊ के तीनों सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं। यज्ञोपवीत (संस्कृत संधि विच्छेद: यज्ञ + उपवीत) धारण करने के संस्कार को उपनयन संस्कार कहा जाता है। उपनयन संस्कार के बाद बालक का गुरुकुल में विद्यारंभ होता है।

यज्ञोपवीतम्-जनेऊ या यज्ञोपवीत।

यह पवित्र धागा सूत से बना होता है, जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर और दाईं भुजा के नीचे पहनता है। यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र है, जिसे विशेष विधि से ग्रंथित करके बनाया जाता है। इसमें सात ग्रंथियां होती हैं और ब्रह्मग्रंथि भी होती है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है। बिना यज्ञोपवीत धारण किए अन्न और जल ग्रहण नहीं किया जाता।

यज्ञोपवीत/ जनेऊ धारण करने की  आयु।

वैदिक शास्त्रों के अनुसार, ब्राह्मण बालक को  9 (8+) वर्ष, क्षत्रिय बालक को 11 वर्ष, और वैश्य बालक को 13 (12+) वर्ष की आयु में यज्ञोपवीत धारण करना चाहिए। संस्कारिक दृष्टि से, विवाह योग्य आयु के पूर्व इस संस्कार का अवश्य होना चाहिए। कुछ परिस्थितियों में, तीव्र बुद्धिमत्ता वाले ब्राह्मण का यह संस्कार पाँच वर्ष (5 years) की आयु में, बलवान क्षत्रिय का यह संस्कार छह वर्ष (6 years) की आयु में, और वैश्य जो कृषि आदि करने की इच्छा रखते हैं, उनका यह संस्कार आठ वर्ष (8 years) की आयु में भी किया जा सकता है।

यहाँ यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि प्रत्येक माता-पिता को यह जानना चाहिए कि सनातन धर्म के अनुसार बालक की देखभाल कैसे की जाए। इस संदर्भ में * निम्नलिखित श्लोक मार्गदर्शन प्रदान करता है।

लालयेत् पंच वर्षाणि, दश वर्षाणि शिक्षयेत्।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥


*लालयेत् पंच वर्षाणि, दश वर्षाणि शिक्षयेत्।

प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥

भावार्थ:

पहले पाँच वर्षों तक बच्चे को स्नेह और प्यार देना चाहिए। अगले दस वर्षों तक उसे शिक्षा और अनुशासन देना चाहिए। और जब वह सोलह वर्ष का हो जाए, तब उसके साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए।

जनेऊ या यज्ञोपवीत अथवा ब्रह्मसूत्र धारण विधि।

पहले ॐ मंत्र का तीन बार जाप करेंहिन्दू धर्मशास्त्रों में "ॐ" को एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण ध्वनि माना गया है। "ॐ" को प्रणव मंत्र कहा जाता है और इसे ब्रह्म/ ईश्वर का प्रतीक माना जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी "ॐ" को परमात्मा का प्रत्यक्ष स्वरूप बताया गया है। इसे "एकाक्षर ब्रह्म" के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसमें केवल एक अक्षर होता है, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है।

उसके उपरांत

ब्रह्म का एकाक्षर मंत्रॐ(ओ३म्)॥
ओम (ॐ) का अर्थ समझकर, उसके सही उच्चारण और जाप
से शारीरिक ऊर्जा को आध्यात्मिक और ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ा
जा सकता है, जिससे व्यक्ति परम आनंद का अनुभव करता है।
"Verified by Shrimad Bhagavatam, Canto 10, Chapter 70."
Meditation (Dhyana) – Meeting with God
Process
:- Meditation (Dhyana) → Absorption (Samadhi) → Dissolution of the worldly state of existence → Upward Ascension of Consciousness (Chetana’s Urdhvagati) → Manifestation of the Subtle Shadow-Energy (Chaya Shakti) → Emergence of the Luminous Divine Energy (Jyotiḥ-Shakti) → Unobstructed, All-Pervading Power (Abadha Shakti) → Meeting and Communication with God.
🔯
[Not attainable for the common soul; possible only for the supremely divine soul]

1.जनेऊ को शुद्ध जल से या यदि सम्भव हो तो गंगा जल से धो लें जिससे उसपर पड़े हुए स्पर्श संस्कार दूर हो जाए। इसके बाद उसको दोनों हाथों के बीच रखकर गायत्री मंत्र का मानसिक या मंद स्वर में मंत्र का जप करें। इतना करने से जनेऊ पवित्र एवं अभिमंत्रित हो जाता है। [श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध (10th) के 39वें अध्याय में गायत्री मंत्र और प्रणव मंत्र को ब्रह्म मंत्र कहा गया है।]

गायत्री मंत्र

ॐ भूर् भुवः स्वः।

तत् सवितुर्वरेण्यं।

भर्गो देवस्य धीमहि।

धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

ॐ प्रकृत्यै नमः ॐ विकृत्यै नमः ॥
ॐ परमात्मिकायै नमः ॐ सर्वभूत हितप्रदायै नमः॥

Gayatri Mantra-Ratan Mohan Sharma

गायत्री मंत्र का अर्थ:
हे मेरी अत्यंत सम्माननीय प्रकृति देवी (प्रकृति), जो देवताओं (दिव्य शक्तियों) के बीच प्रसिद्ध हैं, हम आपकी आराधना करते हैं। हमारे मन को शुभ दिशा में प्रेरित करें। हमें भौतिक संसार (भू) से लेकर आकाशीय संसार (भुव:) तक और उच्च स्तर के अस्तित्व (स्व:) तक ले चलें।

यज्ञोपवीतवर्णनम्
यज्ञोपवीतं त्रिसूत्रात्मकं शुभम्।
प्रत्येकसूत्रं त्रितन्तुमयं स्मृतम्॥
नवतन्तुसमायुतं एवं परम पवित्रम्।
ब्रह्मग्रन्थियुक्तं हि यज्ञोपवीतम्॥

2.इसके बाद किसी प्लेट में या पीपल के पत्ते पर पुष्प की कुछ पंखुड़ियां छिड़कर उसपर ब्रह्मसूत्र को प्रेम और आदर सहित स्थापित कर दें। तत्पश्चात निम्नलिखित (9 देवताओं का आवाहन मंत्र) एक-एक मंत्र पढ़ते हुए चावल अथवा एक-एक पुष्प को यज्ञोपवीत पर छोड़ता जाए।

इस प्रकार यज्ञोपवीत के नौ तन्तुओं, तीन सूत्रों तथा एक ब्रह्मग्रन्थि में देवताओं का आवाहन करें।

जनेऊ या यज्ञोपवीत के तंतुओं में देवताओं का आवाहन मंत्र।

प्रथमतंतौ – ॐ कारम् आवाहयामि।

द्वितीयतंतौ – ॐ अग्निम् आवाहयामि।

तृतीयतन्तौ - ॐ नागसर्पदेवतान् आवाहयामि।

चतुर्थतंतौ – ॐ सोमम् आवाहयामि।

पंचमतंतौ – ॐ पितॄन् आवाहयामि।

षष्ठतंतौ – ॐ प्रजापतिम् आवाहयामि।

सप्तमतंतौ – ॐ अनिलम् आवाहयामि।

अष्ठमतंतौ – ॐ सूर्यम् आवाहयामि।

नवमतंतौ – ॐ विश्वदेवान् आवाहयामि।

यज्ञोपवीत के त्रिसूत्र तथा ब्रह्मग्रन्थि में ब्रह्म और गुरु-देवताओं के आवाहन-मन्त्र।

यज्ञोपवीतग्रन्थितत्त्वम्

(मुक्त छंदः)

यां ग्रन्थिं न धारयति ब्रह्मतत्त्वम्।

सा ग्रन्थिः नाममात्रा, न तु शुद्धतत्त्वम्॥

अतः यज्ञोपवीत की  सूत्र  में आवाहन-मन्त्र इस प्रकार होना चाहिए-

प्रथमसूत्र /प्रथमसूत्रे-

ॐ परब्रह्मणे नमः। चतुर्व्यूहरूपिणं परब्रह्माणम् आवाहयामि।

द्वितीयसूत्र/द्वितीयसूत्रे -ॐ ब्रह्मणे नमः। ब्रह्माणम् आवाहयामि।

तृतीयसूत्र/द्वितीयसूत्रे  – ॐ रुद्राय नमः। रुद्रं आवाहयामि।

अतः यज्ञोपवीत की  ब्रह्मग्रन्थि में आवाहन-मन्त्र इस प्रकार होना चाहिए-

ॐ परब्रह्मणे नमः। चतुर्व्यूहरूपिणं परब्रह्माणम् आवाहयामि।

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शास्त्रीय टिप्पणी:-A

यज्ञोपवीत की ग्रन्थि को “ब्रह्मग्रन्थि” कहा जाता है। ब्रह्मग्रन्थि शब्द दो पदों से बना है - ब्रह्म + ग्रन्थि। इस प्रकार ब्रह्मग्रन्थि का शाब्दिक अर्थ हुआ -“ब्रह्म से सम्बन्धित पवित्र गाँठ।

सनातन धर्मशास्त्र के अनुसार ब्रह्म के चार रूप हैं-वासुदेव, संकर्षण/श्री बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्धइन्हें एक साथ “चतुर्व्यूह-रूप” कहा जाता है।

इस तत्त्व का उल्लेख श्रीमद्भागवतपुराण, विष्णुपुराण तथा पाञ्चरात्र आगम में मिलता है।

[पाञ्चरात्र आगम किसी एक लेखक की रचना नहीं है; यह भगवान नारायण से प्रकट आगमिक परम्परा है। भगवान् नारायण ने इस तत्त्वज्ञान का उपदेश पाँच रात्रियों में प्रदान किया; अतः इस आगमिक परम्परा को “पाञ्चरात्र” कहा जाता है।

आगम = परम्परागत दिव्य शास्त्र।]

चतुर्व्यूह-तत्त्व के अनुसार:-

भगवान श्री वासुदेव (Vasudeva) – परमब्रह्म का मूल प्रकट स्वरूप; शुद्ध चेतना।

श्री संकर्षण (Saṅkarṣaṇa) – ज्ञान तथा अहंकार-तत्त्व से संबद्ध।

श्री प्रद्युम्न (Pradyumna) – मन - इच्छा-शक्ति का तत्त्व।

श्री अनिरुद्ध (Aniruddha) – बुद्धि तथा जगत्-नियमन-शक्ति से संबद्ध।

चूँकि ये ब्रह्म के चतुर्व्यूहरूप हैं, अतः यज्ञोपवीत की ‘ब्रह्मग्रन्थि’ में इनका स्थान पूर्णतः उचित, युक्तिसंगत एवं शास्त्रसम्मत है। यदि ब्रह्मग्रन्थि में ब्रह्म के चतुर्व्यूहरूप-वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध-में से किसी एक का भी आवाहन न किया जाए, तो यह ब्रह्मग्रन्थि अपूर्ण रह जाती है। अतः इनकी उपेक्षा न केवल अनुचित, अपितु धर्मविरुद्ध भी है। धर्माचरणे प्रत्येक व्यक्ति को ध्यान में रखना चाहिए।

यज्ञोपवीतग्रन्थितत्त्वम्

(मुक्त छंदः)

यां ग्रन्थिं न धारयति ब्रह्मतत्त्वम्।

सा ग्रन्थिः नाममात्रा, न तु शुद्धतत्त्वम्॥


शास्त्रीय टिप्पणी:-B

यज्ञोपवीत की पवित्रता, त्रिगुणात्मकता तथा देवसम्बन्ध का उल्लेख।

विभिन्न गृह्यसूत्रों-जैसे आश्वलायन गृह्यसूत्र तथा पारस्कर गृह्यसूत्र-में यज्ञोपवीत की पवित्रता, त्रिगुणात्मकता तथा देवसम्बन्ध का उल्लेख मिलता है। यद्यपि इस प्रकार का विस्तृत तन्तु-आवाहन सर्वत्र समान रूप से निर्दिष्ट नहीं है, तथापि यह मुख्यतः शास्त्र तथा आचार-परम्परा पर आधारित माना जाता है।

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इस प्रकार यज्ञोपवीत में समस्त देवताओं का आवाहन करके ग्रन्थि पर हल्दी/कुमकुम एवं पुष्पाक्षत चढ़ाते हुए कहे कि- आवाहितदेवतायाः यथास्थानं न्यासयामि।

3.इसके बाद पञ्चदेवताः (जगन्नाथ, बलभद्र, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा परमात्मिका प्रकृति) और आवाहित देवताओं की गन्ध-अक्षत से पञ्चोपचार-पूजा करें। तत्पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र से हाथ में जल लेकर ब्रह्मसूत्र-धारण का विनियोग (प्रयोग का उद्देश्य) करें।

पञ्चदैवता-स्वरूपवर्णनम्

जगन्नाथं बलभद्रं च प्रद्युम्नं च अनिरुद्धम्।

परमात्मिकां प्रकृतिं च सृष्टेः पञ्चदैवतानि प्रथमम्॥


एतदतिरिक्तं सर्वेषु गृहगृहेषु पञ्चदेवताः।

ते स्वस्थानवर्तिनः सन्ति पञ्चदेवा इति स्मृताः॥

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पंचोपचार पूजन:-

इस विधि के अंतर्गत भगवान का संक्षिप्त विधि (सुगम विधि) के साथ पूजन होता है.।

1. देवता को गंध (चंदन) लगाना तथा हलदी-कुमकुम चढ़ाना।

2. देवता को पत्र-पुष्प (पल्लव) चढ़ाना।

3. देवता को धूप दिखाना (अथवा अगरबत्ती दिखाना)।

4. देवता की दीप-आरती करना।

5. देवता को नैवेद्य निवेदित करना।

[पंचोपचार पूजन:-पूजन की इस विधि मेँ पाँच मुख्य उपचार (कर्तव्य) हैं

भगवान को स्नान कराने तथा वस्त्र अर्पण के उपरांत

चन्दन, केसर, रोचन, आदि (अष्ट गंध) अनामिका उंगली द्वारा अर्पित करें - भगवान को लगाएँ - रोली और अक्षत लगाएँ।

पुष्पम समर्पयामि - प्रभु के चरणों मेँ ताजे पुष्प अर्पित करें सभी देवों के लिए कुछ विशेष पुष्प भी हैं जिन्हें अवश्य चढ़ाएँ। भगवान को माला पहिनायेँ।

शंकर जी को बिल्व पत्र, भगवान को कमल, और सूर्य देव को लाल कनेर ( सभी को सफ़ेद पुष्प भी चढ़ा सकते हैं, बेला, गेंदा, तगर, पीला कनेर, आदि )

धूप निवेदन - भगवान को धूप निवेदित करें इसके लिए दियासलाई की नई सलाई प्रयोग करके जलाएँ (गुग्गुल, अगर, गुलाब आदि की धूप )।

(अगरबत्ती का प्रयोग न करें तो उत्तम होगा - सनातन धर्म मेँ बांस का जलाया जाना शुभ नहीं माना जाता है )।

आरती - नीराजन करना - आरती के लिए शुद्ध घी का प्रयोग उत्तम है अथवा तेल से भी किया जा सकता है - कर्पूर के द्वारा भी आरती करें।

आरती की थाल दाहिने हाथ मेँ लेकर देव के दाहिनी तरफ घूमायेँ और बाएँ हाथ से घंटी बजाएँ ।

अपने स्थान पर खड़े होकर दो बार दाहिनावर्त घूमें - परिक्रमा करें।

भगवान जी की आरती गावें - ॐ जय जगदीश हरे  अवश्य गायें।

शिशुरूपेण भगवान् रेममाणो जगत्पतिः।
आत्मनः निजरूपं स भक्तये प्रकाशयति॥
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पूजा
यस्यां पूजायां न आवाहितं ब्रह्मरूपम्।
सा पूजा नाममात्रा, न तु शुद्धतत्त्वम्॥
भगवत्प्रसन्नता
(मुक्तछन्दः)
यः भक्तः स्तौति भगवतः चतुर्व्यूहरूपम्,
तस्मै भगवान् भवति प्रसन्नः सदा अत्यन्तम्॥

यः भक्तः स्तौति पार्श्वदेवतानां समरूपम्,
तस्मै भगवान् भवति प्रसन्नः सदा सर्वाधिकम्॥

एतदेव हि परमं सत्यं नित्यम्,
सर्वयुगेषु सर्वकालेष्वपरिवर्तनीयम्॥

सर्वकालेष्वपरिवर्तनीयम्=सर्व+ कालेषु + अपरिवर्तनीयम्
चतुर्व्यूह‑ब्रह्म‑गायत्री‑मन्त्रः
ॐ चतुर्व्यूहरूपं विद्महे
तुलसीपवित्रं धीमहि।
तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्॥
शुद्धस्वरूप‑ब्रह्म‑गायत्री‑मन्त्रः
(ब्रह्म-गायत्री-मन्त्रः)
ॐ चतुर्व्यूहरूपं विद्महे
शुद्धस्वरूपं धीमहि।
तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्॥

Arati (आरती) -Om Jai Jagdish Hare.

उसके बाद शंख ध्वनि करें। यह बात भारतीय संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं में बहुत प्रचलित है कि शंख बजाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। आइए इस मान्यता को आध्यात्मिक, दृष्टिकोण से समझते हैं:

धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण:

पुराणों में उल्लेख: शंख को विष्णु का प्रिय माना गया है और इसे शुभता, पवित्रता और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।

पूजा में प्रयोग: पूजा-पाठ और आरती के समय शंख बजाने से वातावरण शुद्ध और पवित्र होता है, जिससे मन और आत्मा को शांति मिलती है।


शङ्खनादमहिमा।
घोषोऽयं शङ्खनादस्य दैविको पुण्यवर्धनः।
नारायणस्य प्रीत्यर्थं घोषयेत् शङ्खनिस्वनम्॥
नास्ति धर्मे स्त्रीपुंसोः भेदभावः कदाचन।
सर्वे समत्वभावेन कुर्वन्तु शङ्खनादकम्॥

-इसके बाद थाली मेँ नैवेद्य सजाकर भगवान को समर्पित करें -मंत्र-नैवेद्य समर्पयामि  [शुद्ध घी मेँ बने भोज्य पदार्थ भोग हेतु प्रस्तुत करें - गिलास मेँ पीने के लिए जल अवश्य रखें]। .

नैवेद्य मेँ तुलसी पत्र डाल कर थाली के चारों ओर जल घुमायेँ ओर घंटी बजाएँ।

कम से कम कोई मीठी चीज़ तो होनी ही चाहिए - मिश्री, इलायची दाना, लड्डू , पेड़ा (स्टील के बजाए तांबे के बर्तन मेँ नैवेद्य प्रस्तुत करें)।

मंत्र जप व श्लोक पाठ आदि के द्वारा भगवान को प्रसन्न करें

अपना अभीष्ट निवेदित करें।

पूजन मे हुई किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थना करें]

प्रत्येक मनुष्य को पूर्व संस्कार से प्राप्त 
वर्ण (जाति) और यथाविहित आश्रम के अनुकूल
धार्मिक आचरण के अनुसार कर्म करना चाहिए।
 श्रीमद्भागवतम् (10.24)

ब्राह्मणसेवानियमः
देवकार्ये द्वौ ब्राह्मणौ, पितृकार्ये त्रयः।
असमर्थतायां एकः ब्राह्मणः, निमन्त्रणं तु श्रेयः।
श्रीमद-भागवतम ·स्कन्ध 7 , अध्याय 15

4.इसके बाद अपने वेद की शाखा के अनुसार मंत्र ।

(A) ऋग्वेदी :-

( शांखायन तथा अश्वालायन शाखा  )

जनेऊ या यज्ञोपवीत विनियोग :-                             

1.ॐ यज्ञोपवीतमिति मंत्रस्य परमेष्ठी प्रजापतिः ऋषिः।त्रिष्टुप् छन्दः। लिङ्गोक्ता देवता। यज्ञोपवीत धारणे विनियोगः॥

तदन्तर जनेऊ धोकर जनेऊ को दोनों हाथों में लेकर पुनः गायत्री मंत्र पढकर अभिमंत्रित करें और निम्न मंत्र(यज्ञोपवीत धारण मंत्र) बोलते हुए ब्रह्मसूत्र धारण करें।-

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतम् बलमस्तु तेज: ॥

- (पारस्करगृह्यसूत्र २/२/११)-ऋग्वेद।

                                         अथवा

2.जनेऊ या यज्ञोपवीत विनियोग :-

ॐ यज्ञोपवीतमिति मंत्रस्य परमेष्ठी प्रजापति ऋषि: । यजुष्छन्दः। लिङ्गोक्तदेवता । यज्ञॊपवितधारणे विनियोगः ॥

तदन्तर जनेऊ धोकर जनेऊ को दोनों हाथों में लेकर पुनः गायत्री मंत्र पढकर अभिमंत्रित करें और निम्न मंत्र(यज्ञोपवीत धारण मंत्र) बोलते हुए ब्रह्मसूत्र धारण करें-

ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्यत्वोपवीतेनोपनह्यामि॥

(B) शुक्लयजुर्वेदी ।

जनेऊ या यज्ञोपवीत विनियोग॥

ॐ यज्ञोपवीतमिति मंत्रस्य परमेष्ठी प्रजापति ऋषि: । त्रिष्टुप्छन्दः। लिङ्गोक्तदेवता । यज्ञॊपवितधारणे विनियोगः ॥

तदन्तर जनेऊ धोकर जनेऊ को दोनों हाथों में लेकर पुनः गायत्री मंत्र पढकर अभिमंत्रित करें और निम्न मंत्र(यज्ञोपवीत धारण मंत्र) बोलते हुए ब्रह्मसूत्र धारण करें।

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतम् बलमस्तु तेज: ॥-(पारस्कर गृह्यसूत्र २/२/११)-ऋग्वेद।

(C) सामवेदी ।

जनेऊ या यज्ञोपवीत विनियोग :-

ॐयज्ञोपवीतमिति मंत्रस्य परमेष्ठी प्रजापति ऋषि: । यजुष्छन्दः। लिङ्गोक्तदेवता । यज्ञॊपवितधारणे विनियोगः ॥

तदन्तर जनेऊ धोकर जनेऊ को दोनों हाथों में लेकर पुनः गायत्री मंत्र पढकर अभिमंत्रित करें और निम्न मंत्र(यज्ञोपवीत धारण मंत्र) बोलते हुए ब्रह्मसूत्र धारण करें

ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि॥

(Dअथर्ववेदी ।

(  पैप्पलाद शाखा  )।

जनेऊ या यज्ञोपवीत विनियोग :-

ॐ पिप्पलाद ऋषिः । यजुष्छन्दः। लिङ्गोक्तदेवता ।

यज्ञॊपवितधारणे विनियोगः ॥

तदन्तर जनेऊ धोकर जनेऊ को दोनों हाथों में लेकर पुनः गायत्री मंत्र पढकर अभिमंत्रित करें और निम्न मंत्र(यज्ञोपवीत धारण मंत्र) बोलते हुए ब्रह्मसूत्र धारण करें-

ॐ तत्तेऽहं तन्तुं बध्नाम्यायुषे वर्चसे ओजसे तेजसे यशसे ब्रह्मवर्चसाय च ॥

If anybody don't know his own shakha he may chant the undermentioned Mantra.

अगर कोई अपनी शाखा को नहीं जानता है तो वह निम्नलिखित मंत्र का जाप कर सकता है।

जनेऊ या यज्ञोपवीत विनियोग ॥

ऊँ यज्ञोपवीतमिति मंत्रस्य परमेष्ठी ऋषिः, लिंगोक्ता देवताः, त्रिष्टुप् छन्दः यज्ञोपवीत धारणे विनियोगः।।

तदन्तर जनेऊ धोकर जनेऊ को दोनों हाथों में लेकर पुनः गायत्री मंत्र पढकर अभिमंत्रित करें और निम्न मंत्र(यज्ञोपवीत धारण मंत्र) बोलते हुए ब्रह्मसूत्र धारण करें-

जनेऊ या यज्ञोपवीत धारण मंत्र। 

ऊँ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।। - (पारस्कर गृह्यसूत्र २/२/११)-ऋग्वेद

तत्पश्चात् निम्न मंत्र से जीर्ण सूत्र का त्याग करें।

5.पुराना/जीर्ण जनेऊ को सिर पर पीठ की ओर से निकालते हुए निम्न श्लोक का उच्चारण करें-

एतावद्दिन पर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया।

जीर्णत्वात्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथा सुखम्।।

6.इसके बाद नवीन ब्रह्मसूत्र को दाएं हाथ के अंगुठे पर लपेट कर ज्ञानमुद्रा बनाकर हृदय के ऊपर रखकर यथाशक्ति गायत्री मंत्र का जप करें और ऊँ तत् सत् श्री-ब्रह्म-अर्पणम्-अस्तु- बोलकर भगवान को अर्पित कर दें। तत्पश्चात भगवान (परमात्मा ) का स्मरण करें।

उपनयन संस्कार( दक्षिण भारत)।
ऊँ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

पौरोहित्यं परं कर्म परहितार्थधर्म्यकम्
वन्दनीयं सदा तच्च, न कदाचित् निन्दनीयम्॥
अस्मिन् प्रकरणे पुरोहितस्य विश्वरूपस्य मतं स्वमेव।

इस प्रकार जनेऊ को पूर्ण पूजन के साथ संस्कारित करके धारण करना चाहिए।

नित्यं पठ्यते गीता-भागवतम्।
मुक्तिमोक्षप्रदाते एतद् द्वयम्॥


वर्णधर्म और भगवद्भक्ति।

सर्वे स्ववर्णानुसारं स्वधर्मं आचरन्तु , एषः सनातनधर्मस्य परमः नियमः।

तेन सह यदि निःस्वार्था भगवतः भक्तिः च युज्यते, तर्हि किमपि वक्तव्यं नास्ति।

अनुवाद:
सभी लोग अपने वर्णानुसार अपने स्वधर्म का आचरण करें , यही सनातन धर्म का परम (श्रेष्ठ) नियम है।
यदि इसके साथ हरि की निःस्वार्थ भक्ति भी जुड़ जाए, तो फिर कहने को कुछ शेष नहीं रह जाता।


धर्मचर्चाविहीनेषु नष्टे श्रद्धाविवेकयोः।
ईश्वरत्वे बुद्धिभ्रंशः संशयश्च प्रवर्तते॥

वेद एवं धर्मचर्चा के अभाव के कारण, कालक्रम में द्विज
 गण के मन में वेद वाणी के प्रति संदेह उत्पन्न होता है।
 श्रीमद्भागवतम् (10.20) 

English Version.

The procedure  for wearing the sacred thread ( "Janeyu" or "Yajnopavita").

The procedure described here outlines the ritualistic steps for wearing the sacred thread (known as "Janeyu" or "Yajnopavita"). Here is the English translation:

1.Purification of the Sacred Thread or Yajnopavita:

First, chant the 'Om' mantra three times.

Then, cleanse the sacred thread with pure water or, if possible, with water from the Ganges to remove any impurities.

Afterward, hold the sacred thread between both hands and mentally or softly chant the Gayatri mantra to sanctify it. This ritual makes the sacred thread purified and consecrated.

2.Establishing sanctity of the Brahmasutra (Sacred Thread):

Take a plate or a peepal leaf and place some flower petals on it.

Then, lovingly and respectfully place the Brahmasutra on it.

Subsequently, recite invocation mantras for each of the nine deities while offering rice grains or flowers on the sacred thread.

Invocation Mantras for Deities in the Sacred Thread:

First small Thread - I invoke the sound 'Om'.

Second small Thread - I invoke the fire deity 'Agni'.

Third small Thread - I invoke the Nag-serpent deity.

Fourth small Thread - I invoke the moon deity 'Soma'.

Fifth small Thread - I invoke the ancestors.

Sixth small Thread - I invoke the creator 'Prajapati'.

Seventh small Thread - I invoke the wind deity 'Anila'.

Eighth small Thread - I invoke the sun deity 'Surya'.

Ninth small Thread - I invoke all the universal deities.

यज्ञोपवीतग्रन्थितत्त्वम्

(मुक्त छंदः)

यां ग्रन्थिं न धारयति ब्रह्मतत्त्वम्।

सा ग्रन्थिः नाममात्रा, न तु शुद्धतत्त्वम्॥


Thereafter, the invocation mantras for the Brahma-sutra [Three Thread ] in the yajnopavita should be as follows:

First Thread–

Om Parabrahmane namah. I invoke the Parabrahman in the form of the fourfold vyuha.

Second Thread 

Oṃ Brahmane namah. I invoke the deity Brahma.

Third Thread –

Oṃ Rudraya namah.  I invoke the deity Rudra.

Thereafter, the invocation mantras for the Brahma-knot  in the yajnopavita should be as follows:

Om Parabrahmane namah. I invoke the Parabrahman in the form of the fourfold vyuha.

In this manner, after invoking all the deities in the Yajnopavita, while offering turmeric/kumkum and flower petals on the thread, it is said, "May the invoked deities be established according to their positions."

This ritual of invoking all the deities in the Yajnopavita is performed, and then turmeric/kumkum and flower petals are offered while saying, "May the invoked deities be established according to their positions."

Note: The terms used here are specific to Vedic rituals and may vary based on regional customs. 

(Names of the deities and respective mantras for the sacred thread)

3.Performing the Worship:

Apply sandalwood paste (gandha) on the sacred thread and offer turmeric and kumkum.

Offer leaves and flowers to the sacred thread.

Show incense (or light incense sticks) to God.

Perform aarti (wave a lit lamp) for the God.

Offer naivedya (food offering) to the God.

4.Recitation of Mantras and Brahmasutra Dharna:

Perform puja according to your Vedic branch's ritualistic procedures.

ऊँ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।। - (पारस्कर गृह्यसूत्र २/२/११)-ऋग्वेद

Om Yajnopavitam Param Pavitram Prajapateryatsahajam Purastat.

Ayushyamgryam pratimuncha shubhram yajnopavitam balamastu tejh.

Chant the mantra for wearing the sacred thread or Yajnopavita, followed by the Brahmasutra Dharna mantra.

5.Disposal of the Old Thread:

Remove the old sacred thread from over the shoulder, reciting a specific shloka to signify its worn-out state.

6.Wearing the New Sacred Thread:

Wrap the new sacred thread around the right thumb while making a gesture of knowledge (gyan mudra), placing it on the heart, and chanting the Gayatri mantra. Then, say, "Om Tat Sat Sri Brahmarpanam Astu" (meaning, "Let this be offered to the Supreme Brahm").

7.Final Reverence:

Lastly, remember and revere the God.

This comprehensive ritual brings sanctity and spiritual significance to the process of wearing the sacred thread or the Brahmasutra, aligning it with Vedic tradition and principles.

The age for wearing the sacred thread (Yajnopavita/Janeu).

According to scriptures, Brahmin boys should undergo the sacred thread ceremony (Yajnopavita/Janeu) at the age of 9, Kshatriya boys at the age of 11, and Vaishya boys at the age of 13. This ritual should be performed before the eligible age for marriage, regardless of circumstances. In some cases, Brahmin boys with sharp intellects can undergo this ceremony at the age of (5)five, strong Kshatriya boys at the age of six, and Vaishya boys with aspirations for agriculture or other professions at the age of eight.

Duty aligned with Varna.

Let everyone perform their duties according to their own varna , this is a divine principle. If selfless devotion to Hari is added to it, then nothing more remains to be said.

जनेऊ का आध्यात्मिक महत्व:-

जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। 32 विद्याएं चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर होती है। 64 कलाओं में वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई,आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि आती हैं।(श्रीमद्भागवतम्)

जनेऊ संस्कार का महत्व:-

1.जनेऊ का अर्थ दूसरा जन्म है – पहला जन्म माता के गर्भ से और दूसरा जन्म धर्म में प्रवेश से होता है।

2.उपनयन का अर्थ है ज्ञान के नेत्रों का प्राप्त होना, और यज्ञोपवीत का तात्पर्य है यज्ञ और हवन करने का अधिकार प्राप्त करना।

3.जनेऊ धारण करने से ज्ञान, बल, और बुद्धि में वृद्धि होती है, यह भी विश्वास किया जाता है।

4.जनेऊ धारण करने से शुद्ध चरित्र और जप, तप, व्रत की प्रेरणा मिलती है, जो आध्यात्मिक विकास में सहायक है।

5.जनेऊ से नैतिकता और मानवता के पुण्य कर्तव्यों को पूर्ण करने का आत्मबल प्राप्त होता है।

6.यज्ञोपवीत संस्कार के बिना विद्या प्राप्ति, पाठ, पूजा अथवा व्यापार करना सभी व्यर्थ माना गया है।

इस प्रकार, ये सभी बिंदु जनेऊ धारण करने के धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व को दर्शाते हैं।

Knowledge Through Poetry (Especially in Sanskrit)

Poetry makes knowledge last. Verse is easy to remember and simple to transmit, even without writing. In the Sanskrit tradition, wisdom was preserved orally for centuries, carried faithfully through sound and memory. In Sanskrit especially, the power of sandhi allows sounds and meanings to unite within a single, flowing expression. Words do not stand isolated; they merge, resonate, and create a living current of meaning. Poetry enters the heart through rhythm and resonance. No script is required-the Sanskrit word itself, woven through sandhi, shines complete and self-contained. It can travel intact from one heart to another. Even in times of destruction, when manuscripts are lost and structures fall, poetry safeguards knowledge. Memory becomes the temple, sound becomes the scripture, and the living voice becomes the preserver of truth.

Thus, poetry is not merely ornamentation-it is a powerful vessel for holding, protecting, and disseminating knowledge across generations.



धर्मदीपाय सत्यग्रन्थपाठः
शृणुत भक्तगणाः एतद् वचनम्,-
अप्रमाणिकग्रन्थान् मा पठ कदाचन।
एतेषु सर्वेषु ग्रन्थेषु विद्यते अज्ञानता, 
तस्य प्रसारे नश्यति धर्मस्य शुद्धता।
धर्मतत्त्व
धर्मः सत्यं च महाव्यवस्थितिः।
संसारमार्गे सततं सः गतिः॥

नित्यः स्वयं सिद्धः सुशुद्धनिर्मलः।
रूपं विवर्त्यापि न मुञ्चति मूलम्॥

युगे युगे सत्त्वमयः गुणात्मा।
सत्ये स्थितो धर्म एव हि ब्रह्म॥

तस्मात् सतां जीवनमार्गदर्शी।
धर्मः सनातनः मोक्षप्रदर्शी॥
धर्मतत्त्ववर्णनम्
यदा कश्चिद् धर्मो नित्यसारं विहाय ।
तदा स केवलं लोके उत्सवार्थं भवत्येव ॥

ततः जनाः सत्यपथाद् दूरं प्रयान्ति ।
काले गते तु ते सर्वे प्रवाहे विनश्यन्ति ॥

तस्मात् सम्यग्धर्मपथं सर्वदा सेवनीयम् ।
येन आत्मा स्वाभिलषितं धाम पुनः प्रापनीयम् ॥
सम्यग्धर्मपथं=सम्यक् धर्मपथम् 

💓

श्रीजगन्नाथतत्त्वप्रकाशः
(मुक्तछन्दः)
एकः ब्रह्म महाप्रभुः श्रीजगन्नाथः जगदीश्वरः॥
सर्वाधिकारः तस्यैव, नान्यः कश्चित् ईश्वरः॥

मा कुरुत अन्यायं, मा कुरुत अनधिकारकर्म।
अनधिकारिणः सर्वे लभन्ते धर्मतः दण्डम्॥

अहङ्कारो न प्रीयते, न प्रीयते बलदर्पणम्।
विनयः प्रीतिकर्ता स्यात्, तदेव ईश्वराभिलषितम्॥

सर्वेश्वरं महाप्रभुं श्रीजगन्नाथं  भक्तवत्सलम्॥
स्वांशैः सह महाप्रभुः करोति जगतः सञ्चालनम्॥

भक्तानुग्रहकर्ता सः लीलया धृतवान् मनुष्यताम्।
लोकहितार्थम् उद्दिश्य दर्शयति अद्भुतं चरितम्॥
💓
द्विज–द्विजत्वम् 

शृणुत द्विजगणाः, एतत् सत्यवचनम्,
मा कदापि कुरुत द्विजत्वाभिमानम्।
द्विजस्यैष अभिमानः शत्रुरेव समः॥

विनम्रतैव हि ज्ञानं द्विजस्य श्रेष्ठं शस्त्रम्।
तस्य शस्त्रस्याग्रे सर्वं नतमस्तकम्॥
💔

यज्ञोपवीतम्

शृणुत द्विजगणाः सर्वे सत्यं वचनमुत्तमम्।

धारयितव्यं पवित्रं यज्ञोपवीतं शास्त्रसम्मतम्॥

नाभेरधो न यज्ञोपवीतं पतितं स्यात् कदाचन।

धर्मार्थं धारयेन्नित्यं शास्त्रदृष्ट्या द्विजोत्तमः॥

वसिष्ठस्मृति (4.16) मनुस्मृति (2.63)

कात्यायनस्मृति: देवलस्मृति (10.4):

💓

यज्ञोपवीतग्रन्थितत्त्वम्

(मुक्त छंदः)

यां ग्रन्थिं न धारयति ब्रह्मतत्त्वम् ।

तां ग्रन्थिं मन्यते न शुद्धतत्त्वम् ।

यां ग्रन्थिं न धारयति ब्रह्मतत्त्वम् ।

तां ग्रन्थिं मन्यते नाममात्राम् ॥

💓

यज्ञोपवीतग्रन्थितत्त्वम्

 (सूक्तयः)

यज्ञोपवीतस्य ग्रन्थिर्न केवलं सूत्रबन्धनम्।

ब्रह्मस्मृतिधारिणी सा धर्ममार्गस्य चिह्नम्॥


बाह्यसूत्रं यदि भवेत् न तु ब्रह्मपरायणम्।

तदा यज्ञोपवीतं स्यात् केवलं नाममात्रकम्॥


ग्रन्थौ तत्त्वं यदि नास्ति सूत्रं भवति व्यर्थकम्।

ब्रह्मज्ञानविहीनस्य हि धार्यते चिह्नमात्रम्॥

💓

उपवीतवर्जनम्।

द्विजानां बहवः कृतवन्तः उपवीतधारणस्य वर्जनम्।

अविद्यापरिस्थितिः अस्य मुख्यं कारणम्।

सनातनरीत्यनुसारम् एतत् महाहितकरम्।

द्विजानां उपवीतधारणं चिरन्तनं कर्तव्यम्॥

सत्यस्य मौनम् 

(पृथिव्याः यथार्थता)

(मुक्तछन्दः)


न कश्चित् श्रोतुमिच्छति, न कश्चित् सत्यमिच्छति।

सर्वे वक्तुमिच्छन्ति, स्वकथां स्वनाम च॥


न कश्चित् श्रोतुमिच्छति, सर्वे मानगर्विताः।

स्वार्थे मग्नाः जनाः सर्वे, परवाक्यं न शृण्वन्ति॥


आपदि सम्प्राप्तायां तु, सत्यं ज्ञातुमिच्छन्ति।

पूर्वं तु न कश्चिदेव, कदाचन तत्त्वं वेत्ति॥


सर्वे यशःप्रचारेण, स्वनाम विस्तारयन्ति।

सत्यं तु नाङ्गीकुर्वन्ति, परवाक्यं न शृण्वन्ति॥


सत्यं तिष्ठति मौनेन, गर्वेणावृतचेतसाम्।

एषा लोके कठोरेव, पृथिव्याः यथार्थता॥


यः शुद्धात्मा स एवैतत्, जन्मनैव वेत्ति हि।

अन्ये मोहान्धचेतसः, न जानन्ति एव हि॥ 

पूजा

यस्यां पूजायां न आवाहितं ब्रह्मरूपम्।

सा पूजा नाममात्रा, न तु शुद्धतत्त्वम्॥

💓

पञ्चदैवता-स्वरूपवर्णनम्

जगन्नाथं बलभद्रं च प्रद्युम्नं च अनिरुद्धम्।

परमात्मिकां प्रकृतिं च सृष्टेः पञ्चदैवतानि प्रथमम्॥


एतदतिरिक्तं सर्वेषु गृहगृहेषु पञ्चदेवताः।

ते स्वस्थानवर्तिनः सन्ति पञ्चदेवा इति स्मृताः॥

💓

अज्ञानिनां मिथ्याप्रचारः

(ब्रह्मतत्त्वे अज्ञानम्)

अज्ञानी मूर्खा न जानन्ति श्रीबलभद्रम्।

श्रीशेषनागं बलभद्रनाम्ना कुर्वन्ति वर्णनम्॥


ते श्रीप्रद्युम्नं च श्रीअनिरुद्धं च न जानन्ति।

महाज्ञानी इति स्वयम् लोके प्रचारयन्ति॥


अज्ञानं ब्रह्मतत्त्वे, अज्ञानं सिद्धियोगशास्त्रे।

मिथ्याज्ञानं ते लोकेऽस्मिन् प्रचारयन्ति गुरुरूपे॥

💓

गुरु-स्तोत्रम्

(गुरुतत्त्व)

गुरुर्ब्रह्मा गुरुः शंकरः गुरुर्देवो जगदीश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥


सिद्धगुरोर्द्वौ गुणौ स्मृतौ -सिद्धिश्च ब्रह्मज्ञानम्।

ताभ्यां यः शिक्षयेत् शिष्यान् स एव श्रीगुरुः मतः॥


💔

जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण करने वालों को वेद, गीता और श्रीमद्भागवतम्  का सार ज्ञात होना चाहिए।

 जो इस प्रकार हैं 

वेदार्थसारः

वेदो हि शब्दब्रह्मैव रहस्यान्तरदुर्लभः ।

तं वेत्ति केवलो देवो सम्यगाच्नुते नान्योऽर्थं ॥

ज्ञानकर्मप्रयोजनं तत्र मुख्यं सनातनम् ।

ब्रह्मात्मैक्यविज्ञानं तद्वेदार्थस्य सारकम् ॥

ब्रह्मात्मैक्यविज्ञानं=ब्रह्म (Brahma)

आत्म (Atman) ऐक्य (unity)

विज्ञानं (knowledge)

💧

गीतात्वभागवतातत्त्वम्

(मुक्त–छन्दः)

(गीतात्वभागवतदर्शनम्)

गीता निःस्वार्थकर्मस्य विधिं मोक्षदायिनीं दर्शयति।

यया पुरुषस्य मोहितस्य बन्धनमुक्तिः सिध्यति॥


श्रीमद्भागवते दिव्यप्रेम्णः सौन्दर्यं हृदयं विशुद्धयति।

यया निष्कामकर्मधर्मविधिं मोक्षदायिनीं दर्शयति।


सा दर्शयति सम्यक् पूजां, न केवलं क्रियायाम्,

किन्तु निःस्वार्थकर्मभक्त्योः ऐक्ये परं ब्रह्मदर्शनम्॥

💓

भगवत्कथाश्रवणस्य महिमा
(तीर्थातीतं भगवत्स्मरणम्)
अहं अज्ञानी मनसि आशां बिभ्र्याम्।
सर्वानि तीर्थानि भ्रमणेन द्रक्ष्यामि।
परन्तु भगवत्कृपया श्रवणे ज्ञातवान्।
केवलं भगवत्कथाश्रवणमननचिन्तने।
सर्वतत्त्वतीर्थपुण्यज्ञानं विद्यमानम्।
एष अज्ञानिभक्तेभ्यः ददाति ऊर्ध्वमार्गम्।

एष सनातनधर्मस्य सनातनमतम्॥

💥

वेदज्ञानविपर्यासदोषः

वेदस्य शुद्धं ज्ञानं ये न जानन्ति जन्तवः।

शब्दार्थं तद्विपरीतं मन्यते ज्ञानमित्येव॥

स्वविनाशं कुर्वन्तो स्वयमेव विनश्यन्ति।

एतत्सत्यं निश्चयं चैव प्रमाणं च सनातनम्॥

💓

कर्तृत्वाभिमान-फलत्यागयुक्त कर्मयोगः

निःस्वार्थभावेन स्वकर्मणां पालनं हि स्वधर्मः उत्तमः।

निष्कामभावेन स्वकर्मणां पालनं हि स्वधर्मः परमः॥

कर्तृत्वाभिमान-फलत्यागेन युक्तं तत् श्रेष्ठमुत्कृष्टम्॥

वेदपुराणसारस्य ग्रहणम्

वेदपुराणसारस्य ग्रहणं अतीव  दुःसाध्यं सदा।

हरेः कृपासम्पन्ने एव तदेव ग्रहीतुं विद्यते क्षमता।

💓

अन्नब्रह्मतत्त्वश्लोकः

अन्नं ब्रह्मेति श्रुतिषु सनातनम्,

भोजनं यज्ञरूपमुदाहृतम्॥

शुद्धे मनसि यत्र हि शुद्धमन्नम्,

तत्रैव वसति परं ब्रह्म नित्यम्॥

-----------------------

ब्रह्मतत्त्वविहीनग्रन्थजीवगुरुवर्णनम्

(ब्रह्मतत्त्वमहिमा)

यस्य ग्रन्थे न विद्यते ब्रह्मतत्त्वं,

तत् शास्त्रं न भवति पूर्णसत्यम्॥


यो जीवः न जानाति ब्रह्मतत्त्वं,

स जीवः न जानाति पूर्णतत्त्वम्॥


यो जीवः न जानाति ब्रह्मतत्त्वम्,

स न गुरुः न पण्डितः शास्त्रमतम्॥


यो जीवः न जानाति ब्रह्मतत्त्वम्,

रुद्धमेव भवति तस्य मोक्षद्वारम्॥

★★

सनातनधर्मस्य प्रथमः सोपानः

(The First Step of Sanatana Dharma)

प्रथमं सत्पुरुषो भव, ततः सर्वकर्माण्याचर।

कामक्रोधलोभवर्जितः, दयामार्गे सदा स्थितः॥


हत्याहिंसाविनिर्मुक्तः, धर्ममार्गे दृढस्थितः।

लोकहिते सदा युक्तः, सत्ये नित्यं प्रतिष्ठितः॥


दयाशीलसमायुक्तः, न्यायमार्गे व्यवस्थितः।

एषः सनातनधर्मस्य, प्रथमः सोपानः स्मृतः॥

सनातनधर्मस्य द्वितीयः सोपानः

(The Second Step of Sanatana Dharma)

प्रथमं निष्कामकर्म स्यात्, द्वितीयं तत्त्वज्ञानार्जनम्।

तृतीयो भक्तियोगश्च, चतुर्थं आत्मप्रकाशकम्॥


कर्मयोगेन चित्तशुद्धिः, ज्ञानयोगेन ज्ञानार्जनम्।

भक्तियोगेन भक्तिप्राप्तिः, जीवहिते श्रेष्ठा गतिः॥


सर्वे मार्गाः लक्ष्यन्ते, लभ्यते मोक्षः स्यात्।

एषः सनातनधर्मस्य, द्वितीयः सोपानः स्मृतः॥

💓

अति सर्वत्र वर्जयेत्।

(अति-संयमः )

अतिधनं हि चित्तं मदेन नुदति, सत्यपन्थानं न पश्यति ध्रुवम्।

अतिसौन्दर्यमपि स्वयम् अहङ्कारदीपं प्रज्वालयत्यवश्यम्॥


अतिभोजनं देहे भारं विधाय विवेकं मन्दं करोति सततम्।

अतिसुखं प्रमादं प्रसूय धीधैर्यं क्षीणं करोति निरन्तरम्॥


अतिगर्वो हि जीवस्य दृष्टिं सत्यात् पराङ्मुखीं करोति निश्चितम्।

सर्वं स्खलति तदा यदा हृदि राजते दुर्निवारितोऽहङ्कारदर्पम्॥


अतिविद्या–अल्पविद्याभ्यां हृदि जायतेऽहंममतिदर्पः।

सर्वं स्खलति तस्यैव यदा वसति दुर्निवार्योऽहङ्कारदर्पः॥


इति नीतिः सनातनी - हितं सत्‌पथं पन्थानमाचरेत्।

यतो धर्मस्य मूलं हि सदाचारं - अति सर्वत्र वर्जयेत्॥

शङ्खध्वनिः
शङ्खध्वनिः शुभः कार्यो नरनार्यः समाहिताः।
विष्णोः पूजाविधौ पुण्यं पापनाशनमुत्तमम्॥
न स्त्री न पुरुषो भेदो धर्मे कर्मणि सत्ययोः।
शङ्खध्वनिः सदा कार्यो नारायणप्रसन्नये॥
💓
पापं दया-दण्डः
(मुक्तछन्दः)
अज्ञानेन कृतं पापं दया भवति सदा।
ज्ञानेन कृतं पापं दण्डः निश्चितः तदा॥

सर्वदा कर्मफलं ज्ञात्वा विवेकं सम्पादयेत्।
यद् अज्ञानात् कृतं पापं तत् क्षम्यतामिति स्फुरेत्॥
महान्
(मुक्त छन्दः)
यः स्वयम् आत्मानं महान् मन्यते स न भवति महान्।
यं भगवान् महान् करोति स एव भवति महान्॥
भावभङ्ग्या वचनेन वेशेन कश्चित् न भवति महान्॥
उत्तमज्ञानेन च उत्तमकर्मणा एव सर्वे भवन्ति महान्॥

महान् 
(मुक्त छन्दः)
यः स्वयमात्मानं महान् मन्यते स न भवति महान्।
यं भगवान् महान् करोति स एव भवति महान्॥

भावभङ्ग्या वचनेन वेशेन कश्चित् न भवति महान्॥
उत्तमज्ञानेन च उत्तमकर्मणा एव सर्वे भवन्ति महान्॥
★★
संस्कृतज्ञानकाव्यम् - महिमा-तत्त्वम्

महिमा संस्कृतस्य-शब्दब्रह्मस्वरूपिणी।
धर्मशास्त्रस्य रक्षिणी सत्यस्य च प्रकाशिनी॥

तत्त्वं ब्रह्म पुनरुक्तं संस्कृतेऽनन्तसौष्ठवम्।
ध्वन्या सम्पूर्णकाव्येन हृदये शाश्वतं स्थितम्॥

काव्ये स्थितं ज्ञानमिदं न नश्यति कदाचन।
छन्दोबद्धं सुगमं स्मृतौ वहति मानवमानसम्॥

लेख्याभावेऽपि सततं वाणी पथेन गच्छति।
श्रुतिपरम्परया नित्यं तत्त्वदीपो न म्रियते॥

सन्धिना शब्दसंयोगोऽर्थानां सागरायते।
एकत्वेन प्रवहन्त्येव भावाः हृदि विराजन्ते॥

लयतालसमायुक्तं काव्यं हृदयं प्रविशति।
स्वररूपेण सम्पूर्णं ज्ञानं लोके प्रपद्यते॥

विनाशकालेऽपि यदा ग्रन्था भवन्ति नश्यन्ति।
स्मृतिरूपे मन्दिरे तु सत्यवाणी विराजते॥

जीवन्नादः शास्त्ररूपो धारयत्येव तत्त्वतः।
काव्यमेव हि साधनं ज्ञानरक्षणकारणम्॥

संस्कृतं श्रेष्ठभाषा सा सन्धियुक्ता सुसंहतिः।
स्वयंपूर्णा प्रकाशेन शब्दराशिः विराजते॥

हृदयाद् हृदयं याति सुलभं नित्यं ध्रुवम्।
धर्मशास्त्रस्य संरक्षणं सत्यस्य च प्रसारणम्॥

💓
प्रणामाशिषो नियमः
यः साष्टाङ्गं प्रणमति भक्त्या विनयान्वितः ।
तस्मै दातव्यमाशीर्वादं हृदयेन विशुद्धया ॥

यस्य शक्तिर्वर्तते तु आशीर्वादप्रदायने ।
स प्रयत्नेन दद्यात् तत् धर्ममार्गानुसारतः ॥

यदि शक्तिविहीनोऽपि दातुं न शक्नुयाद् जनः ।
तदा तत्प्रणतिं देवे समर्प्य प्रणतो भवेत् ॥

तस्य क्षेमं च कल्याणं प्रार्थयेत् श्रीहरिं प्रति ।
एष धर्मः सनातनः शाश्वतो नियमो ध्रुवः ॥
💓

हे प्रभु जगन्नाथ, आपकी प्रेरणा से मैं यह लेख लिख रहा हूँ। यदि मुझसे कोई भूल हो गई हो, तो कृपया क्षमा करें।🙏

🔯
सच्चिदानन्दं परब्रह्म आद्याशक्तिं परमेश्वरीम्।
अनन्तं च माधवं च नमामि पादपङ्कजे॥
नाहं ज्ञानी न च विद्वान् ।
मम सर्वं श्रीजगन्नाथस्य दानम्॥

An enlightened being or self-aware person does
 not fear death because they know that death is
  not the  end of life, but rather a new phase and
 a fresh  beginning in the soul's journey.
🔯

Prabir is an Indian author who was born into a Utkal Brahmin family in the Indian state of West Bengal. He is known for his books, which are sold through Amazon.com, Flipkart.com, and Abebooks.com. Prabir is known for his genre/style of writing and has gained a dedicated following of readers who appreciate his unique perspective/engaging storytelling/etc. Prabir has a passion for writing and has dedicated his career to creating engaging and thought-provoking works for his readers. His books and articles cover a wide range of genres and topics, and he is highly popular within the intellectual community for his contributions.

प्रबीर एक भारतीय लेखक हैं। उनका जन्म भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल में एक उत्कल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी किताबें Amazon.com,flipkart.com और abebooks.com के जरिए बेची जाती हैं। 12 लाख से अधिक लोगों ने उनकी किताबें और लेख पढ़े हैं।

 सूचना का स्रोत:-

1.Wikipedia.

2.Brahmin scholars of India.

3.शकुन्तला देवी;- शकुन्तला देवी लखनऊ विश्वविद्यालय तथा उसके महिला परास्नातक महाविद्यालय में ३७वर्षों तक संस्कृत प्रवक्ता,विभागाध्यक्षा रहकर प्राचार्या पद से अवकाशप्राप्त ।

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